बुद्ध पूर्णिमा: क्यों है खास और कैसे मनाते हैं लोग?
क्या आप जानते हैं कि हर साल शरद ऋतु में एक ऐसा दिन आता है जब बौद्ध धर्म के अनुयायी भगवान बुद्ध की जन्म‑जन्मान्तिक मृत्यु को याद करते हैं? वही है बुद्ध पूर्णिमा. यह चंद्रमा का उज्ज्वल पूर्णिमापूर्ण चरण होता है और कई देशों में बड़े उत्सव के साथ मनाया जाता है। भारत में भी लद्दाख, सिक्किम, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे हिस्सों में इस दिन विशेष पूजा‑पाठ होते हैं।
इतिहास और धार्मिक महत्व
बुद्ध पूर्णिमा का जश्न भगवान सिद्धार्थ गौतम के जन्म (भिक्खु) और उनका निर्वाण (परिनिर्वाण) दोनों को एक साथ मनाता है। पुरानी ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन वह लुम्बिनी में जन्मे थे, जो अब नेपाल में स्थित है। चंद्रमा की पूरी रोशनी का प्रतीक माना जाता है – ज्ञान की चमक जो अंधकार (अज्ञान) को दूर करती है। इसलिए बौद्ध भिक्षु और साधक अक्सर इस दिन ध्यान‑ध्यान के लिये विशेष समय चुनते हैं।
देश‑व्यापी उत्सव कैसे होते हैं?
हिमालय की शीतली घाटियों में, लद्दाख के मठों में धूप‑दीप जलाते हुए भिक्षु मंत्रोच्चारण करते हैं। बंगाल के बर्दे में नदी किनारे मोती के जैसे फूलों से सजाए गए प्लेटर पर स्नान किया जाता है और फिर दान‑धर्म किए जाते हैं। महाराष्ट्र में, विशेष रूप से पुण्यतिरथियों के बीच ‘वेजा’ नामक मिठाई बनाकर बाँटते हैं। इन छोटे‑छोटे रीति-रिवाज़ों का एक ही मकसद होता है – मन को शुद्ध करना और समाज में सौहार्द बढ़ाना।
यदि आप इस दिन कुछ नया आज़माना चाहते हैं, तो स्थानीय बौद्ध मंदिर या केंद्र से जुड़ें। अक्सर वे खुले कार्यक्रम रखते हैं जहाँ पवित्र धूप‑दीप जलाकर सामूहिक प्रार्थना की जाती है। बच्चों को कहानी सुनाने के सत्र भी होते हैं; इससे न सिर्फ संस्कृति सीखते हैं बल्कि आत्मा में शांति का एहसास भी बढ़ता है।
अभी हाल ही में कुछ प्रमुख समाचारों ने इस तिथि को और रोशन किया है। उदाहरण के तौर पर, कई बड़े शहरों में डिजिटल लाइट शो की योजना बनी है ताकि युवा वर्ग को आकर्षित किया जा सके। साथ‑ही साथ, पर्यावरण‑सुरक्षा पहलें भी चल रही हैं – प्लास्टिक मुक्त समारोह आयोजित कर लोग कचरे को कम करने की कोशिश कर रहे हैं। ये सभी बाते दिखाती हैं कि परम्पराएँ बदलती हैं लेकिन मूल भावना वही रहती है।
आपको बस इतना करना है कि इस पूर्णिमा के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें, साफ‑सुथरा कपड़ा पहनें और अपने घर या स्थानीय मंदिर में शांति से प्रार्थना या ध्यान करें। अगर समय मिल जाए तो एक छोटी सी दान‑शिल्पी (भोजन, वस्त्र) भी दे सकते हैं – इससे न केवल आपके अंदर संतोष मिलेगा बल्कि दूसरों को भी मदद मिलेगी।
बुद्ध पूर्णिमा का असली सार है “सच्चाई की रोशनी” को हर दिल तक पहुँचाना। चाहे आप किसी भी धर्म के हों, इस दिन एक बार शांति‑ध्यान करने से मन में नई ऊर्जा और स्पष्टता आती है। तो अगली बार जब चाँद पूरी तरह चमके, याद रखें – यह सिर्फ आकाश का खेल नहीं, बल्कि आपके अंदर की रोशनी को जगाने का अवसर है।